Poetry

बाज़ार

ये हुस्न का बाज़ार , ये अदाओं की मेहफ़िल..
ये दिल के व्यापारी , ये हसीनाओं की तहसील ..
बिनभूले हम यहाँ रोज़ चले आएँ , तो गलत ही क्या है ..
जो दिल को थोड़ा सहला ले आज – तो गलत ही क्या है ..
 

अंधेरों में चलने वालों को क्या सही, क्या गलत,
हमारी तो ज़िंदगी खुद तराजुओं में सिमट गई ..
जिन तरसती आँखों को कभी खुशियों का उजाला न दिखा,
आज हुस्न का रोशनदान देख जगमगा गए – तो गलत ही क्या है ..
 

दुनियाँ में हर चीज़ खरीदी नहीं जा सकती,
बेपाक मोहब्बत शोहरत की मोहताज़ नहीं ..
जिनपर कभी झुकी, अदब भरी निगाहों का वार ही न हुआ,
वो अगर आज बिकता इश्क़ खरीद थोड़ा प्यार पा ले – तो गलत ही क्या है ..
 

ज़िंदगी भर पतझड़ के पन्नों की तरह उड़ते रहें ,
किसी ज़ुल्फ़ की छाँव नसीब ना हुई ..
जो दर दर भटकते रहे दिल में नमक लिए,
आज पलभर प्यार के साहिल से टकरा गए – तो गलत ही क्या है ..
 

किसीने अपनाया नहीं, अपनों ने भी पराया कर दिया ..
सिसक सिसक रोया हूँ मैं, फ़िर आसुओं से ही गुज़ारा कर लिया ..
किसीने दिल में बसाया ही नहीं जिसे,
आज उसने बदनाम गलियों का सहारा ले लिया – तो गलत ही क्या है ..

 

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2 thoughts on “बाज़ार

  1. RATNADEEP, I just saw this movie. Interesting coincidence, although I believe Nana Patekar is referring to the capitalist ‘Bazaar’ in his novel titled ‘Bazaar’. Even then, I was surprised to see some similarities in my work and his from the movie. Like his death in a ‘bazaar’ and in the end I also saw the word ‘Roshandaan’ scribbled in his rough text of the novel in progress- ‘Bazaar’.

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