Poetry

याऱी

जो दोस्तों की मेहफ़िलें सजा करती थी कभी,
दिलवालों का फिर एक मेला लगा करता था..
उन हवाओं की बात ही कुछ और थी यारों,
उन फिजाओं में यारी का धुआँ भी तो उठा करता था..

जो हसता था कोई, तो कोई रोया करता था,
कभी सुख, तो कभी यहाँ दुःख भी तो बटा करता था..
जो राह तेरी, वो मेरी हुआ करती थी कभी,
मंज़िलों तक का सफ़र भी तो साथ ही कटा करता था..

उस वक़्त में रूहानी कोई बात थी यारों,
जब बेजान पत्थर भी गुनगुनाया करते थे..
ढलता सूरज मुस्कराता डूबने से पहले,
कुछ ऐसी रात की वो बात हुआ करती थी..

आसुओं में हँसी निकल जाए, हिदायतें कुछ ऐसी मिला करती थी,
और होश खो देते फिर, कुछ ऐसी रौनक उस माहौल में हुआ करती थी..
आसमानों को छूते, चट्टानों से टकराते, कुछ ऐसी ताकत उस बंद मुट्ठी में थी,
यार से बड़ी यारी, यही धरम, यही इनायत हुआ करती थी..

मुकम्मल जहाँ का हौसला था उस ज़ान में,
जब अपने दोस्त साथ हुआ करते थे..
सिर न झुका  किन्ही तूफ़ानों के आगे ,
फिर उन क़दमों की चाल ही कुछ और थी..

तन्हाई का वार अब बर्दाश्त नहीं होता,
वो बीते पल लौट भी तो नहीं आते..
याद आती है मगर, ये बचे हुए लम्हे,
यूँ ही बस कट भी तो नहीं जाते..
अकेले चल पड़े इक दिन क्यों, जाने किससे लढने,
एक बार भी न देखा मुड़कर, के हम क्या छोड़ चले थे..
गुस्साई तकदीर ने पासा जो पलटा,
लो आज वो दिन भी आ गया,
के सामने मंजिल है लेकिन – रास्ता धुंधला गया..
रास्ता धुंधला गया..
रास्ता धुंधला गया..

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One thought on “याऱी

  1. One more…not mine..read somewhere…
    “Yeh antim din yu hi gujar jayenge,
    Kuch bhool jaengi batein, kuch pal yaad aayenge.
    Jee lo yeh chaar din, hass khel ke sath sath,
    Kal ka pata nahi,waqt ke jharokhe kahan le jayenge.”

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