Poetry

सवाल

वो जो दबे पाओं आती है ,
मेरी साँसों के ज़रिये ,
हर पल अपना एहसास कराती हुई ,
पूछती है यह सवाल के- तू जीता क्यों नहीं ?
ज़िन्दगी ये तमाम – इसके ज़ाम तू पीता क्यों नहीं ?

उगते सूरज के उजाले से ,
मेरी दुनियाँ को करती जगमग ,
जो खिलखिलाती सी, गुदगुदाती हुई ,
ये कहती है पल पल – के तू जलता है क्यों ?
ज़िन्दगी की इन रंजिशों से – तू बेहेलता है क्यों ?

उस चाँद की शीतल छाओं के तले ,
निशा के उन अंधेरों को बिखेरती ,
जो चंचल पवन मेरे गालों को चूमती हुई ,
ये इज़हार करती है – के तेरा दिल मचलता क्यों नहीं ?
किसीके खयालों में गुम – ये फिसलता क्यों नहीं ?

और यूँ गुज़र जाता है एक और दिन ,
सवालों के जवाब हैं, जो मिलते ही नहीं ..
लेकिन दिल में कहीं ये आस होती है ज़रूर – कल ज़िन्दगी मुझसे पूछे –
के कबसे जिये जा रहा है, मुझे भुलाता क्यों नहीं ?
जो बेकार है ये जहाँ तेरे लिये – यहाँसे चला जाता क्यों नहीं ?

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