Poetry

कर्ज़

मेरी लाश पर गिद्ध बनकर मंडराना ज़रूर और नोंच -नोंच खाना मेरे बदन का ज़र्रा – ज़र्रा के दुआ देगी तुझे ये रूह मेरी जो मौत पे ही सही , इस बदक़िस्मत को तूने छुआ तो कभी नियति का ख़ेल आज यहाँ ख़त्म होता है के जिन नापाक लबों ने हमें बेग़ैरत किया था भरी … Continue reading